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Monday, December 5, 2022
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    कभी 15 – 15 रुपए में धोते थे कैंटीन में बर्तन, आज इस प्लान से खड़ी की 250 करोड़ की कंपनी

    आपकी किस्मत किस समय बदल जाये कोई नहीं जानता। आप सबकुछ हासिल कर सकते हैं अगर आप हार नहीं मानते हैं। आज साउथ इंडियन फूड के लिए चर्चित देश के खास रेस्तराओं में एक है सागर रत्ना। इस रेस्टोरेंट की दुनिया भर में ब्रांचेज हैं। लेकिन आप शायद ही जानते होंगे कि इस रेस्‍टोरेंट चेन को स्थापित करने वाले शख्‍स ने कभी 18 रुपये के वेतन पर एक कैंटीन में प्‍लेट धोया था।

    दृढ़ इच्छाशक्ति आपको सफलता के शिखर तक पंहुचा सकती है। बस आपको सकारात्मक रहना होगा। कठिनाइयों से हार न मानते हुए और अपने दम पर कुछ कर दिखाने की चाह ने जयराम बानन को एक बड़ी और फेमस रेस्‍टोरेंट चेन का मालिक बना दिया है। जयराम का जन्‍म मंगलौर के पास स्थित ‘उडुपी’ में हुआ था। उनके पिता ड्राइवर थे और बहुत ही गुस्‍सैल स्‍वभाव के थे। कई बार गलती करने पर उनके पिता ने बानन की आंख में मिर्ची पाउडर तक डाल दिया था।

    गरीबी की यादें अभी भी उन्हें याद है। जब तक आप कड़ी मेहनत नहीं करते हैं तब तक कुछ हासिल नहीं होता है। कई दिनों तक भटकने के बाद जयराम को एक कैंटीन में नौकरी मिली थी। इसमें प्‍लेट धोने से लेकर टेबल साफ करने का काम उन्हें दिया गया था। इसके लिए उन्हें मासिक सैलरी 18 रुपये मिलती थी। जयराम उडुपी समुदाय से ताल्‍लुक रखते हैं. इसी समुदाय ने मुंबई में मसाला-डोसा से सभी को परिचय कराया है। मुंबई में बहुत सारे कॉम्‍पिटीटर को देखते हुए बानन ने दिल्‍ली का रुख करना बेहतर समझा।

    आपको निरंतर प्रयास करने होते हैं। उन्होंने बहुत संघर्ष के बाद इस सफलता को हासिल किया है। 1973 में जयराम मुंबई से दिल्‍ली आये थे। दिल्‍ली में इनका भाई एक उडुपी रेस्‍टोरेंट में काम करता था। यहां पर आकर बानन ने 1974 सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्‍स की कैंटीन का टेंडर लिया। 1986 में बानन ने 5 हजार रुपये की सेविंग और दोस्तों-रिश्तेदारों से लोन लेकर डिफेंस कॉलोनी में सागर नाम से पहला आउटलेट खोला।

    किसी भी बड़े मुकाम को हासिल करने के लिए काफी संघर्षों का सामना करना पड़ता है। यहां पर बानन को सप्ताह में 3,250 रुपये रेंट देना होता था। इस आउटलेट में 40 लोगों के बैठने की जगह थी। पहले दिन की बिक्री 408 रुपए की हुई थी। बानन बताते हैं कि दिल्ली में शुरुआती दिन काफी कठिन थे, क्योंकि लोग दक्षिणी भारतीय डिश से ज्यादा अवगत नहीं थे। लेकिन खुद पर भरोसा था। आज इनकी सफलता की कहानी सभी की ज़ुबान पर है।

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