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Saturday, June 19, 2021

क्या आप जानते हैं महाशिवरात्रि का गृहस्थ और साधकों के लिए पूजा का अलग अलग मुहूर्त और शुभ योग

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    11 साल की उम्र में ही संभाला पिता का बिज़नेस, आज कमा रही है लाखो में

    बड़ी उम्र में सफलता हासिल करना, कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन, छोटी उम्र में सफलता की इबारत लिखना, वाकई एक बहुत बड़ी बात है। आपको एक ऐसी ही युवती की बड़ी सफलता के बारे में बताने जा रहा है। महाराष्ट्र के अहमदनगर से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित निघोज गांव निवासी, 21 वर्षीया श्रद्धा धवन अपने पिता के डेयरी फार्म चलाती हैं और एक महीने में छह लाख रूपये कमाती हैं। वह याद करते हुए कहती हैं, उनके घर में कभी भी छह से अधिक भैसें नहीं रहीं।

    एक समय ऐसा भी था, जब साल 1998 में उनके परिवार में केवल एक भैंस ही थी। इस सक्सेस स्टोरी की शुरुआत 1998 से शुरू होती है जब श्रद्धा धवन का परिवार तंगगाली से गुजर रहा था।

    धवन के परिवार में कभी 6 भैसें होती थीं जिससे दूध का अच्छा धंधा चल रहा था और परिवार भी मजे से चल रहा था। 1998 आते-आते परिवार में सिर्फ एक भैंस बच गई क्योंकि आर्थिक तंगहाली की वजह से भैंसों को बेचकर खर्च चलाया जाने लगा।

    आपको बता दे कि श्रद्धा धवन के पिता दिव्यांग हो गए इसकी वजह से उन्हें काम करने में दिक्कत होने लगी। इसका असर उनके कारोबार पर पड़ा। तब श्रद्धा 11 से 12 साल की थी तब उसने सोचा कि पिता की मदद करनी चाहिए।

    उसके बाद श्रद्धा पिता के साथ काम सीखने लगी और मेले भी जाने लगी जहां वो भैंसे खरीदते थे। श्रद्धा ने बताया कि धीरे-धीरे मुझे चीजें समझ में आने लगीं। मैं भैंसों की नस्ल समझने लगी। इसके बाद मैंने दूध निकालना भी सीख लिया। श्रद्धा ने एक इंटरव्यू में बताया है, मेरे पिता जी बाइक ठीक से नहीं चला पाते थे।

    मेरा भाई काफी छोटा था इसलिए वह पिता जी का काम नहीं संभाल सकता था। इसलिए 11 साल की उम्र में मैंने खुद यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेना शुरू कर दिया। हालांकि यह मेरे लिए अटपटा काम था क्योंकि हमारे गांव में कोई लड़की डेयरी के काम नहीं थी और किसी ने कभी ऐसा काम करते हुए देखा भी नहीं था।

    श्रद्धा कहती हैं कि जैसे-जैसे काम आगे बढ़ता जा रहा था। मैं भैंसों की संख्या बढ़ाते जा रही थी। 2016 में हमारे पास करीब 45 भैंसें हो गई थीं। और हर महीने हम ढाई से तीन लाख का बिजनेस कर रहे थे। हमने कुछ डेयरी वालों से टाइअप कर लिया था। हम घरों में दूध बांटने की बजाय डेयरी वालों को दूध देने लगे।

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